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इस आधुनिक युग में त्रेताकालीन आयुर्वेद का आगमन

जितना भी यह जगत है मानो चार प्रकार की श्रेणियां हमें दृष्टिगत होती है। सर्वप्रथम स्थावर द्वितीय अण्डज और जगम व उदभिज यह चार प्रकार की श्रृष्टि कहलाता है यह चारों प्रकार की सृष्टि एक दूसरे में ओत-प्रोत रहती है। अर्थात् आयुर्वेद हमारे महान ग्रन्थ अथर्ववेद का अंग है। जो परमात्मा की वाणी है। आयु+वेद यह दो शब्दों से मिलकर बना है। आयु का अर्थ आयु (उम्र) वेद कहते है। ज्ञान के प्रकाश को अर्थात् ज्ञान के प्रकाश में आयु को सुरक्षित रखना यह आयुर्वेद की परिभाषा है वनस्पति विज्ञान एक ऐसा महान विज्ञान है। जो कि आपको लाखों जनम भी कम पड़ जायेगें इस प्रभु की सृष्टि में ऐसी-ऐसी औषधियां विद्यमान है। यदि आप उस पर अनुसंधान करेगें तो जन्म-जन्मान्तर कम पड़ जायेगें औषधि के एक-एक परमाणु में आपको ब्रह्मांड के ब्रह्मांड नजर आयेगें आप जिस चीज का भी सेवन करते हो। जल से लेकर कुछ भी हो, वह सब आयुर्वेद है।

आप चन्द्रमा पर चले जायें, मंगल पर चले जायें, सूर्य में प्रवेश करो आपको वहाँ भी यह आयुर्वेद प्राप्त होगा।

जैसे हमारे यहाँ आदिकाल से इस भूमि पर बड़़े-बड़े वैद्यराज रहें हैं। राजा रावण के काल में सुधन्वा वैद्यराज थे उनकी प्रतिष्ठा भी आयुर्वेद में ही हुई है।

जब श्रीराम व रावण का संग्राम हो रहा था, तब मेघनाथ ने एक विशेष अग्निबाण का लक्ष्मण पर प्रहार किया तो उस बाण में यह विशेषत थी कि जैसे ही सूर्य की किरण पृथ्वी व लक्ष्मण को स्पर्श करती उसके साथ साथ उनके प्राण निकल जाते, तब उन वैद्यराज ने हनुमान को बताया कि अमुख पर्वत पर चले जाओं और वहाँ रात्रि में जो औषधि मोती की तरह चमकती हो उसे ले आओ परन्तु ध्यान रहे कि उस औषधि को सुर्योदय से पहले ही लाना है, अन्यथा उसका प्रभाव समाप्त हो जाएगा।

हनुमान जी समय पर आ गये और लक्ष्मण जी के प्राणों की रक्षा हो गई जैसे किसी भी कार्य को सीखनें के लिए उनपर बनाये हुए नियमों पर चलना होता है। वैसे हमारे यहाँ आदिकाल से ही यज्ञों का चलन रहा है। यज्ञ अग्निहोत्र, हवन यह पृथ्वी की नाभि कहलाती है। यज्ञ संसार का सर्वश्रेष्ठ कर्म है। यज्ञ से सृष्टि का सन्तुलन बना रहता है। उसकी सुगन्धी की सोगात से सारा ब्रह्मण्ड विशेष तरंगों से ओत-प्रोत हो जाता है। जैसे कृषक को अपनी अच्छी फसल के लिए वाजयेयी यज्ञ करना होता है। दुश्मन पर विजय पाने के लिए अश्वमेघ यज्ञ करना होता है। वैसे ही आयुर्वेद को जानने के लिए अमावोष्टि व पूर्णावोष्टि यज्ञ करना चाहिए।

आयुर्वेद को जानने के लिए हमें अपनी एक आचार-संहिता बनानी होगी। सर्वप्रथम यज्ञ को अपनाना होगा।

द्वितीय हमें हिंसा नहीं करनी चाहिये, क्योंकि आयुर्वेद में हिंसा के लिए कोई स्थान नहीं है। यद्यपि आदिकाल में कुछ आयुर्वेदाचार्य ऐसे भी हुए है जो हिंसा में लिप्त रहें हैं।

जैसे पहले भी अस्थमा के रग्ण (रोग) में मछली का रक्त पीते थे उसकी जगह हम पीपल पंचाग, त्रिजटा, त्रिकुटा व सम्भूनि इन सबका रस बनाकर देगें तो यह रोग दूर हो जाता है। अर्थात् हमें मछली के रक्त की आवश्यकता नहीं रहेगी। हमें रोगों में वनस्पति विज्ञान को अपनाना चाहिए इन्हीं से आयु बलवती होती है।

इन्हीं से रोग दूर होते है। आजकल आयुर्वेद तो है लेकिन जानकार कम है। इसका कारण अपनी संस्कृति धर्म पर विश्वास न करके दूसरों की संस्कृति अपना रहें है। पहले आयुर्वेद में पंचागों का बड़ा ही महत्व था उन्हें ही पान करते थे जैसे यह पीपल पंचाग बनाते है, उसमें उसके पत्ते, फल, छाल, तना, जड़ यह पाँचों चीजे लेकर के विधि विधान से तैयार करते है। और उसका हम प्रातःकाल जल से सेवन करते हैं। तो शरीर में वह विशेष क्रिया-कलाप फूँकता है। निरन्तर सेवन करने से आप अद्भुत अनुभव करोगे, गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने लिखा है कि मैं सब वृक्षों में पीपल का वृक्ष हूँ। जरूर कुछ इस वृक्ष में विशेषतायें रही होगीं पीपल के वृक्ष की यदि रक्षा की जाये तो इसकी आयु 35000 वर्ष है। वट वृक्ष का भी आयुर्वेद में बड़ा वर्णन किया गया है। इस वृक्ष का पंचाग बलवती होता है। शारीरिक बल के लिए इसका सेवन करना चाहिए। इसकी आयु 50,000 वर्ष होती है। एक वृक्ष होता है त्रिकुट, यह उस वन में प्राप्त होता है जहाँ पक्षीगण भी कोई-कोई रहता है। इस वृक्ष के लिए बहुत से आयुर्वेदाचार्य ऋषि, मुनियों ने अपने प्राणों की आहूति दी है। इस वृक्ष में विशेषता है कि इसकी छाल अपनी जीभ से स्पर्श कर दे तो आपकी जीभ हाथी की सूंड की तरह बढ़ने लगेगी। और उसकी जड़ अगर आप स्पर्श कर दे तो वह आकुचन क्रिया में आ जाती है, और अपने स्थान पर विराजमान हो जाती है। अगर आप उसका पंचाग सेवन करें तो आपकी आयु भी 3000 वर्ष हो जायेगी क्योंकि उस वृक्ष की आयु भी 75000 से 80,000 वर्ष होती है।

आप जो भी सेवन करते है, वही परमाणु आपके शरीर में बलवती होते जाते है और आपकी काया को परिवर्तित करते रहते है। एक विलग अर्थात बेल होती है ‘‘सोमलता’’ उसकी यह विशेषता होती है कि जैसे अमावस की रात्रि आती है, वह बेल पत्र विहीन हो जाती है। जैसे ही प्रतिपदा द्वितीय शुरू होती है तो उसमें से पत्र निकलनें शुरू हो जाते है। पूर्णिमा के दिवस यह पत्रों से ओत-प्रोत हो जाती है। उसका सेवन करने से मानों आप षोडष कलाओं के ज्ञाता बन जाते हैं कला से हमारा तात्पर्य है। जैसे जल हमें जल के परमाणु जानने चाहिये उससे अस्तशस्त्रों का निर्माण होता है। जैसे वरूणअस्त्र है इससे आप जल के ही परमाणु जान सकते है वायु कला है, अग्नि कला है। ध्राण कला है, चशुकला है इन्हीं 16 कलाओं के ज्ञाता भगवान श्रीकृष्ण जी थे, श्रीराम 12 कलाओं को जानते थे आपकों आयुर्वेद के मर्म जानने के लिए विशेष औषधि का सेवन करना चाहिए ताकि आपके मस्तिष्क की ग्रंथिओं का स्पष्टीकरण हो सके अर्थात् वह औषधियों के गम्भीर रहस्यों के ग्रहण कर सके, शरीर में तीन ही दोषारोहण होते है। (वात, पित्त, कफ) वात बनाम वायु वायु दोष बिगड़ने से वायु के रोग उत्पन्न हो जाते है। पित्त बनाम अग्नि अग्नि के दोष बिगड़ने से अग्नि की बीमारियां का जन्म होता है और कफ बनाम जल जल के दोष बिगड़ने से जल की बीमारियां आ जाती है। कुछ बीमारियां मिश्रित दोष बढ़ने से भी होती है। शरीर में वायु का प्रकोप हो गया है। उसे वायु नाशक औषधि प्रदान करनी चाहिए रूग्ण (रोग) उनका शान्त हो जाता है। जैसे पित्त बिगड़ने से अग्नि के रूग्णों का जन्म हो जाता है। उन रूग्णों में शीतल औषधियां प्रदान करनी चाहिये जिससे अग्नि (पित्त) का रोग शान्त हो जाता है। रूग्ण शरीर से दूर चला जाता है। कफ जल की मात्रा शरीर में अधिक होने के कारण अनेक रोग जन्म ले लेते है। उन्हें अग्निवर्धक औषधि प्रदान करनी चाहिये औषधियों में कई गुण विद्यमान रहते है जैसे तेज है। तैज प्रदान करने वाला होता है। कुछ औषधि ऐसी है। जिन्हें सेवन करने से चित्त की (वृत्ति) शान्त रहती है। अर्थात् शान्त चित होकर प्रभु का स्मरण करने लगता है। कुछ औषधियां ऐसी होती है। जो ज्ञान-विज्ञान के गम्भीर मर्म को मस्तिष्क में निहित करा देती है। कुछ रोगों को हरती है। औषधियों की आप इस प्रभु के राष्ट्र में गणना नहीं कर सकते औषधि अनन्त है। लेकिन जानने के लिए है। यहाँ सब कुछ और जो कोई जानोगें की नहीं वह कैसे पायेगा आप जहाँ भी पग रखोगे वहीं औषधि पाओगे प्रभु के राष्ट्र में कोई औषधि ऐसी नहीं है जो महत्वहीन हो सबका अपना-अपना कार्य है। प्रभु ने किसी भी महत्वहीन पदार्थ को नहीं जन्मा है। औषधि से लेकर चारों प्रकार की सृष्टि 84 लाख योनि सब प्रभु की ही गाथा गा रहें हैं। जिसने सभी को उत्पन्न किया है। जो प्रलय का कारण है। उस प्रभु को मालूम था कि आचार संहिता बिगड़ने से रूग्ण जन्म लेगें अवश्य ही उसी के निदान हेतु प्राणों की रक्षा के लिए स्थावर सृष्टि की सर्वप्रथम रचना की स्थावर सृष्टि पर सभी निर्भर है।

आयुर्वेद इस पृथ्वी पर 1 अरब 97 करोड़ 85 लाख कुछ हजार वर्षों से चल रहा है। मनुष्य के शरीर में 10 करोड़ 10 लाख 10 हजार दो सौ दो नश नाडि़यां होती है। एक-एक औषधि इस पृथ्वी पर ऐसी है। जो सभी नाडि़यों को शुद्ध कर देती है।

यह औषधि विज्ञान 32 वर्षों के अथक प्रयत्न से विशेष महान औषधियों से लेकर प्राचीन युग (अग्निहोत्र) पुट्ठों, पंचांगों, के सिद्धान्तां से तैयार की गयी है औषधि सेवन करते ही शरीर में अपना क्रिया-कलाप फूँकती है असाध्य बीमारियों में कुछ ही घंटो में शान्ति प्रदान करती है। ब ीमारियों की आयुनुसार कुछ समय औषधिपान करने से हमेशा के लिए शान्त हो जातें हैं। औषधि में विशेष प्राणसत्ता होने के कारण प्रातःकाल केवल एक बार सेवन की जाती है।

यह औषधि वनस्पति विज्ञान पर पूर्ण रूप से आधारित है। यह औषधि आयुवर्धक भी है इसका कोई भी दुष्प्रभाव नहीं है।

वात विकार (वायु विकार) – सीने में भारीपन, दर्द, जलन, आंतरिक सूजन, बाहरी सूजन, गठिया बाय (ऑर्थराइटिस), कंधों का दर्द, गर्दन का दर्द (सरवाइकल), सुन्नपन, कम्पन, गर्दन, कमर, जाम होना। लीवर(यकृत) की कोई भी बीमारी हो जैसे- लीवर का दर्द, सिकुड़ना, फैलना, फैट आदि पुराना बुखार, वमन (उल्टी), ब्लड उल्टी होना सोयारसिस। पित्त विकार (अग्नि विकार)- माइग्रेन का दर्द, डिप्रेशन, दौरा, नाक का मांस बढ़ना, तलवों में जलन। तिल, मस्से, पैठ, बावासीर (खूनी बावासीर), भगन्दर, अल्सर, नकसीर, ल्यूकोरिया, मूत्ररोग, धातु का बहना, गुदा का बाहर आना, गदूद, घोंघा, गर्भ प्रसारण बाहर आना, सफ़ेद फूल (कुष्टरोग) बिस्तर पर पेशाब करना आदि।


नोट– यह सभी औषधि भारत सरकार से मान्यता प्राप्त है।

1. यह औषधि 24 घंटे में केवल एक बार सेवन की जाती है।

2. यह औषधि पूर्णरूप से वनस्पति विज्ञान पर आधारित है।

3. यह औषधि यज्ञों, पुट्ठों, पंचांगों पर आधारित है।

4. इन औषधियों में प्राचीन आयुर्वेद का समावेश है।



अन्वेषणकर्ता – धर्मेंद्र आर्य

सम्पर्क सूत्र – 7500343834, 9528024140

डॉ0 सत्यप्रकाश वत्सल

बी0 ए0 एम0 एस0

(गुरुकुल कांगड़ी हरिद्वार, उत्तराखंड)

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